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21 Feb 2014

विमान-अपहरण

विमान-अपहरण

मैं ताजों के लिये समर्पण, वंदन गीत नहीं गाता
दरबारों के लिये कभी
अभिनन्दन-गीत नहीं गाता
गौण भले हो जाऊँ लेकिन मौन नहीं हो सकता मैं
पुत्र- मोह में शस्त्र त्याग कर द्रोण नहीं हो सकता मैं
कितने भी पहरे बैठा दो मेरी क्रुद्ध निगाहों पर
मैं दिल्ली से बात करूँगा भीड़ भरे चौरोहों पर

दिल्ली को कोई आतंकी जादू- टोना लगता है
गीता-रामायण का भारत बौना -बौना लगता है
विस्फोटों की अपहरणों की स्वर्णमयी आजादी है
रोज गौडसे की गोली के आगे कोई गाँधी है
मैनें भू पर रश्मिरथी का घोड़ा रुकते देखा है
पाँच तमंचों के आगे दिल्ली को झुकते देखा है

हम पूरी दुनिया में बेचारे- से हैं
अपमानों की ठोकर के मारे- से हैं
मजबूरी संसद की सीरत लगती है
अमरीका की चौखट तीरथ लगती है
मैं दिनकर का वंशज दिल्ली को दर्पण दिखलाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ

जब भारत का यान खड़ा था कंधारों की धरती पर
असमंजसता बनी हुई थी भारतीयों की मुक्ति पर
भीम छुपाकर मुँह बैठे थे बेशर्मी के दामन में
अर्जुन का गांडीव पड़ा था कायरता के आँगन में
रावन अट्टहास करता था पंचवटी की राहों में
राम घिरे लाचार खड़े थे गठबंधन की बाँहों में

हम हमदर्दी खोज रहे थे काबुल वाले गैरों में
हमने टोपी जाकर रख दी अफगानों के पैरों में
जो अफगानी आतंकों की शैली गढ़ते देखे हैं
जिनके बाजू केसर की क्यारी तक बढ़ते देखे हैं
जो दामन में ओसामा लादेन छिपाकर बैठे हैं
अपनी आँखों में पिंडी के नैन छुपाकर बैठे हैं

उनकी साजिश-मक्कारी से मेरा भारत छला गया
और वार्ता करने उनके दरवाजे पर चला गया
भारत खून-सने हाथों से हाथ मिलाने पहुँच गया
सिंहराज कुत्तों के आगे पूंछ हिलाने पहुँच गया
अफगानी चेहरे से उजले मन के भीतर काले थे
तालिबान के सारे पासे मामा शकुनी वाले थे

उनसे कोई आशा करना दिल्ली की नादानी थी
इस चौसर में हर युधिष्ठिर की निश्चित हो जानी थी
दिल्ली के दरबार फ़ैसले ग़लत वरण कर बैठे हैं
पांडव खुद ही पांचाली का चीर-हरण कर बैठें हैं

स्वाभिमान को रहन किये बैठे हैं हम
खुद्दारी को दहन किये बैठे हैं हम
हमने सीने में अपमान सहेज लिया
हत्यारों के साथ मंत्री भेज दिया

मैं इस नादानी पर मुट्ठी कस -कस कर रह जाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ

जिनके दिल में दया नहीं उमड़ी रमजान महीने में
उनको फर्क नहीं मासूमों के मरने में जीने में
जब हत्यारों ने इंसानी रिश्ते-नाते त्यागे थे
और फिरौती में दिल्ली से छत्तिस कैदी मांगे थे
तब दिल्लीवालों ने केवल निर्णय एक लिया होता
छत्तिस के छत्तिस को तोप के मुँह से बांध दिया होता

काश हमारी दिल्ली की आँखों में काल दिखा होता
सिंहासन की आँखों का भी डोरा लाल दिखा होता
और चुनौती दे दी होती सीधे रावलपिंडी को
भीष्म पितामह क्षमा नहीं कर सकते और शिखंडी को
नयन तीसरा डमरू वाले शिव ने खोल दिया होता
ऊँचे स्वर में लालकिले से हमने बोल दिया होता
तनिक खरोंचें भी आई जो भारत के बाशिंदों को
जिन्दा एक नहीं छोड़ेंगे बंदी पड़े दरिंदों को
बंधक भी बचते भारत का गौरव भी जिन्दा रहता
और हमारा सर दुनिया में यूँ ना शर्मिंदा रहता
आतंकों के आँधी -तूफां - बादल सब रुकते दिखते
चंदा-तारे भारत माँ के चरणों में झुकते दिखते

काश उन्हें हम हिन्दुस्तानी पानी याद दिला देते
उनको क्या उनके पुरखों को नानी याद दिला देते
लेकिन हम तो हर कीमत पर समझौते के आदी हैं
मुँह पर चाँटा खाते रहने वाले गाँधीवादी हैं

ये कायरता का ना खेल हुआ होता
गद्दी पर सरदार पटेल हुआ होता
उग्रवाद की उम्र साँझ कर दी जाती
हर आतंकी कोख बाँझ कर दी जाती

मैं दरबारों की लाचारी को चाणक्य पढ़ाता हूँ
इसीलिए मैं केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ

मुक्त रुबिया का हो जाना निर्णय ग़लत हुआ हमसे
और तभी पूरी घाटी धुंधलाई आतंकी तम से
हमने अपनी खुद्दारी के सही जलजले नहीं किये
और हमारे दरबारों ने लौह-फ़ैसले नहीं किये
अर्जुन मछली की आँखों पर तीर चलाना चूक गये
मुट्ठी भर जुगनू सूरज के ज्योति-कलश पर थूक गये

राजनीति ने अपनी ही सेना के बाजू तोड़ दिए
बारी-बारी समझौतों में ख़ूनी कातिल छोड़ दिये
जब सिंहासन का राजा ही कायर दिखने लगता है
तो पूरा मौसम हत्यारा डायर दिखने लगता है
आखिर यूँ झुकते-झुकते दुनिया से क्या ले लेंगे हम
कोई दिल्ली मांगेगा तो क्या दिल्ली दे देंगे हम

बंधकजन के परिजन भी सब खुदगर्जी में झूल गये
अपने रिश्ते याद रहे भारत माता को भूल गये
उनके हर परिजन ने कायर होने का आभास दिया
नहीं किसी ने त्याग-धर्म का दिल्ली को विश्वाश दिया
काश कि उनके परिवारों ने हिम्मत ना तोड़ी होती
हमने जग में देश-प्रेम की अमर कथा जोड़ी होती
आखिर उन परिवारों की भी कोई जिम्मेदारी थी
सच पूछो तो दिल्ली उनके परिवारों से हारी थी

क्या ये देश उन्हीं का है जो सीमा पर मर जाते हैं
अपना खून बहाकर टीका सरहद पर कर जाते हैं
ऐसा युद्ध वतन की खातिर सबको लड़ना पड़ता है
संकट की घड़ियों में सबको सैनिक बनना पड़ता है
जो भी कौम वतन की खातिर मरने को तैयार नहीं
उसकी संतति को आजादी जीने का अधिकार नहीं

अब जग के दादाओं से डरना छोडो
और कराची से अपना नाता तोड़ो
अब एक और महाभारत लड़ना होगा
चक्र सुदर्शन लेकर के अड़ना होगा

मैं अर्जुन को श्रीकृष्ण की गीता याद दिलाता हूँ
इसीलिए मै केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ

किसके कितने लाल सलोने सीमा पर छिन जाते हैं
गुरु गोविन्द जी बेटे दीवारों में चिन जाते हैं
झाँसी की रानी लड़कर रजधानी मिटवा देती है
पन्ना धाय वफ़ादारी में बेटा कटवा देती है
मंगल पांडे आजादी का परवाना हो जाता है
उधम डायर से बदले को दीवाना हो जाता है

घास-फूँस की रोटी खाकर राणा नहीं लड़े थे क्या
बन्दा बैरागी के सर पर हाथी नहीं चढ़े थे क्या
वीर हकीकत राय धर्म की खातिर मरते देखे हैं
ऋषि दधिची भी अपनी हड्डी अर्पण करते देखे हैं
हाड़ी रानी शीश काट कर थाली में रख देती है
ये गाथा उनको सूरज की लाली में रख देती है

जेल भरे क्यूँ बैठे हैं हम आदमखोर दरिंदों से
आजादी का दिल घायल है जिनके गोरखधंधों से
घाटी में आतंकवाद के कारक सिद्ध हुए हैं जो
बच्चों की मुस्कानों के संहारक सिद्ध हुए हैं जो
उन जहरीले नागो को भी दूध पिलाती है दिल्ली
मेहमानों जैसी बिरयानी-मटन खिलाती है दिल्ली

आज समय को उत्तर देना ही होगा सिंहासन को
चीरहरण की कौन इजाजत देता है दुशाशन को
न्याय-व्यवस्था निर्णय करने में मजबूर रही तो क्यों ?
इनकी गर्दन फाँसी के फंदों से दूर रही तो क्यों ?
जिनकी जहरीली साँसों में आतंकों की आँधी है
उनको जिन्दा रखने में दिल्ली असली अपराधी है

कानूनों की हथकड़ियों को कड़ा करो
इनको फाँसी के फंदों पर खड़ा करो
पागल कुत्ते की हत्या मजबूरी है
गद्दारों को फाँसी बहुत जरुरी है

मैं बजरंगबली को उनकी ताकत याद दिलाता हूँ
इसीलिए मै केवल अग्नीगंधा गीत सुनाता हूँ


डॉ. हरिओम पंवार




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सम्बंधित कविताएं...

9 Feb 2014

घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

मैं भी गीत सुना सकता हूँ शबनम के अभिनन्दन के
मै भी ताज पहन सकता हूँ नंदन वन के चन्दन के
लेकिन जब तक पगडण्डी से संसद तक कोलाहल है
तब तक केवल गीत पढूंगा जन-गण-मन के क्रंदन के

जब पंछी के पंखों पर हों पहरे बम के, गोली के
जब पिंजरे में कैद पड़े हों सुर कोयल की बोली के
जब धरती के दामन पार हों दाग लहू की होली के
कैसे कोई गीत सुना दे बिंदिया, कुमकुम, रोली के

मैं झोपड़ियों का चारण हूँ आँसू गाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

कहाँ बनेगें मंदिर-मस्जिद कहाँ बनेगी रजधानी
मण्डल और कमण्डल ने पी डाला आँखों का पानी
प्यार सिखाने वाले बस्ते मजहब के स्कूल गये
इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गये

कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल चलें
सोन -चिरैया सूली पर है पंछी गाना भूल चले
आँख खुली तो माँ का दामन नाखूनों से त्रस्त मिला
जिसको जिम्मेदारी सौंपी घर भरने में व्यस्त मिला

क्या ये ही सपना देखा था भगतसिंह की फाँसी ने
जागो राजघाट के गाँधी तुम्हे जगाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

एक नया मजहब जन्मा है पूजाघर बदनाम हुए
दंगे कत्लेआम हुए जितने मजहब के नाम हुए
मोक्ष-कामना झांक रही है सिंहासन के दर्पण में
सन्यासी के चिमटे हैं अब संसद के आलिंगन में

तूफानी बदल छाये हैं नारों के बहकावों के
हमने अपने इष्ट बना डाले हैं चिन्ह चुनावों के
ऐसी आपा धापी जागी सिंहासन को पाने की
मजहब पगडण्डी कर डाली राजमहल में जाने की

जो पूजा के फूल बेच दें खुले आम बाजारों में
मैं ऐसे ठेकेदारों के नाम बताने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

कोई कलमकार के सर पर तलवारें लटकाता है
कोई बन्दे मातरम के गाने पर नाक चढ़ाता है
कोई-कोई ताजमहल का सौदा करने लगता है
कोई गंगा-यमुना अपने घर में भरने लगता है

कोई तिरंगे झण्डे को फाड़े-फूंके आजादी है
कोई गाँधी जी को गाली देने का अपराधी है
कोई चाकू घोंप रहा है संविधान के सीने में
कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में
कोई ढाँचे का गिरना यू. एन. ओ. में ले जाता है
कोई भारत माँ को डायन की गाली दे जाता है

लेकिन सौ गाली होते ही शिशुपाल कट जाते हैं
तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

जब कोयल की डोली गिद्धों के घर में आ जाती है
तो बगुला भगतों की टोली हंसों को खा जाती है
इनको कोई सजा नहीं है दिल्ली के कानूनों में
न जाने कितनी ताकत है हर्षद के नाखूनों में

जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है
तब माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है
जब-जब भी जयचंदों का अभिनन्दन होने लगता है
तब-तब साँपों के बंधन में चन्दन रोने लगता है

जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते हैं
तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते हैं
सिंहों को 'म्याऊं' कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है
बिल्ली में क्या ताकत होती कायरता दिल्ली में है

कहते हैं यदि सच बोलो तो प्राण गँवाने पड़ते हैं
मैं भी सच्चाई गा-गाकर शीश कटाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

'भय बिन होय न प्रीत गुसांई' - रामायण सिखलाती है
राम-धनुष के बल पर ही तो सीता लंका से आती है
जब सिंहों की राजसभा में गीदड़ गाने लगते हैं
तो हाथी के मुँह के गन्ने चूहे खाने लगते हैं

केवल रावलपिंडी पर मत थोपो अपने पापों को
दूध पिलाना बंद करो अब आस्तीन के साँपों को
अपने सिक्के खोटे हों तो गैरों की बन आती है
और कला की नगरी मुंबई लोहू में सन जाती है

राजमहल के सारे दर्पण मैले-मैले लगते हैं
इनके ख़ूनी पंजे दरबारों तक फैले लगते हैं
इन सब षड्यंत्रों से परदा उठना बहुत जरुरी है
पहले घर के गद्दारों का मिटना बहुत जरुरी है

पकड़ गर्दनें उनको खींचों बाहर खुले उजाले में
चाहे कातिल सात समंदर पार छुपा हो ताले में
ऊधम सिंह अब भी जीवित है ये समझाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

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सम्बंधित कविताए...

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भुखमरी पर हरी ॐ पंवार की कविता


मेरा गीत चाँद है न चांदनी है आजकल, ना किसी के प्यार की ये रागिनी है आजकल|

मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये, साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ़ कीजिये|

मै गरीब के रुदन के आंसुओ की आग हूँ, भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूँ|

मेरा गीत आरती नही है राज पट की, जगमगाती आत्मा है सोये राज घट की|

मेरा गीत झोपडी के दर्दो की जुबान है, भुखमरी का आइना है, आंसू का बयान है|

भावना का ज्वार भाटा जिये जा रहा हू मै, क्रोध वाले आंसुओ को पिए जा रहा हू मै|

मेरा होश खो गया है लहू के उबाल में, कैदी होकर रह गया हू, मै इसी सवाल में|

आत्महत्या की चिता पर देख कर किसान को, नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को||

सोच कर ये शोक शर्म से भरा हुआ हू मै, और मेरे काव्य धर्म से डरा हुआ हू मै |

मै स्वयं को आज गुनेहगार पाने लगा हू, इसलिए मै भुखमरी के गीत गाने लगा हू|

गा रहा हू इसलिए की इन्कलाब ला सकूं | झोपडी के अंधेरों में आफताब ला सकूं|

इसीलिए देशी और विदेशी मूल भूलकर, जो अतीत में हुई है भूल, भूल कर|

पंचतारा पद्धति का पंथ रोक टोक कर, वैभवी विलासिता को एक साल रोक कर|

मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए, झोपडी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए|

मेहरबानों भूख की व्यथा कथा सुनाऊंगा, महज तालियों के लिए गीत नहीं गाऊंगा|

चाहे आप सोचते हो ये विषय फिजूल है, किंतु देश का भविष्य ही मेरा उसूल है|

आप ऐसा सोचते है तो भी बेकसूर है, क्योकिं आप भुखमरी की त्रासदी से दूर है|

आपने देखि नही है भूखे पेट की तड़प , भूखे पेट प्राण देवता से प्राण की झड़प|

मैंने ऐसे बचपनो की दास्ताँ कही है, जहाँ माँ की सुखी छातियों में दूध नही है|

जहाँ गरीबी की कोई सीमा रेखा ही नही, लाखो बच्चे है जिन्होंने दूध देखा ही नहीं|

शर्म से भी शर्मनाक जीवन काटते है वे, कुत्ते जिसे चाट चूके, झुटन चाटते है वे|

भूखा बच्चा सों रहा है आसमान ओढ़ कर, माँ रोटी कम रही है, पत्थरों को तोड़ कर|

जिनके पाँव नंगे है,और तार तार है, जिनकी सांस सांस साहूकारों की उधार है|

जिनके प्राण बिन दवाई मृत्यु के कगार है, आत्महत्या कर रहे है भूख के शिकार है |

बेटियाँ जो शर्मो हया होती है जहान की, भूख ने तोडा तो वस्तु हो गई दुकान की|

भूख आत्माओ का स्वरूप बेच देती है, निर्धनों की बेटियों का रूप बेच देती है|

भूख कभी कभी ऐसे दांव पेंच देती है, सिर्फ 2000 में माँ बेटा बेच देती है|

भूख आदमी का स्वाभिमान तोड़ देती है, आन बान शान का गुमान तोड़ देती है|

भूख सुदमाओ का अभिमान तोड़ देती है, महाराणा प्रताप की भी आन तोड़ देती है|

किसी किसी मौत पर धर्म कर्म भी रोता है,क्योंकि क्रिया क्रम का भी पैसा नहीं होता है|

घरवाले गरीब आंसू गम सहेज लेते है, बिना दाह संस्कार मुर्दा बेच देते है|

थूक कर धिक्कारता हू , मै ऐसे विकास को, जो कफ़न भी देना पाए गरीबों की लाश को|

भूख का निदान झूटे वायदों में नही है, सिर्फ पूंजीवादियो के फायदे में नही है|

भूख का निदान कर्णधारों से नही हुआ, गरीबी हटाओ जैसे नारों से नही हुआ|

भूख का निदान प्रशाशन का पहला धर्म है, गरीबों की देखभाल सिंहासन का धर्म है|

इस धर्म की पलना में जिस किसी से चुक हो, उस के साथ मुजरिमों के जैसा ही सलूकहो|

भूख से कोई मरे ये हत्या के समान है, हत्यारों के लिए मृत्युदंड का विधान है|

कानूनी किताबो में सुधर होना चाहिए, मौत का किसी को जिम्मेदार होना चाहिए|

भूखो के लिए नया कानून मांगता हु मै, समर्थन में जनता का जूनून मांगता हु मै|

ख़ुदकुशी या मौत का जब भुखमरी आधार हो, उस जिले का जिलाधीश सीधा जिम्मेदारहो|

वह का एम् एल ए , एम् पी भी गुनेहगार है, क्योंकि ये रहनुमा चुना हुआ पहरेदार है|

चाहे नेता अफसरों की लॉबी आज क्रुद्ध हो, हत्या का मुकदमा इन्ही तीनो के विरुद्धहो|

अब केवल कानून व्यवस्था को रोक सकता है, भुखमरी से मौत एकदिन में रोक सकताहै|

आज से ही संविधान में विधान कीजये, एक दो कोल्लेक्टरो को फंसी तंग दीजिये|

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