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19 May 2014

नज़रिया कैसा हो...? एक शिक्षाप्रद कथा

Ball with 2 colour
मास्टर जी क्लास में पढ़ा रहे थे , तभी पीछे से दो बच्चों के आपस में झगड़ा करने की आवाज़ आने लगी।
“क्या हुआ तुम लोग इस तरह झगड़ क्यों रहे हो ? ” , मास्टर जी ने पूछा।
राहुल : सर , अमित अपनी बात को लेकर अड़ा है और मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है।
अमित : नहीं सर , राहुल जो कह रहा है वो बिलकुल गलत है इसलिए उसकी बात सुनने से कोई फायदा नही।
और ऐसा कह कर वे फिर तू-तू मैं-मैं करने लगे।
मास्टर जी ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा , ” एक मिनट तुम दोनों यहाँ मेरे पास आ जाओ।
राहुल तुम डेस्क की बाईं और अमित तुम दाईं तरफ खड़े हो जाओ। “
इसके बाद मास्टर जी ने कवर्ड से एक बड़ी सी गेंद निकाली और डेस्क के बीचो-बीच रख दी।
मास्टर जी : राहुल तुम बताओ , ये गेंद किस रंग की है।
राहुल : जी ये सफ़ेद रंग की है।
मास्टर जी : अमित तुम बताओ ये गेंद किस रंग की है ?
अमित : जी ये बिलकुल काली है।
दोनों ही अपने जवाब को लेकर पूरी तरह कॉंफिडेंट थे की उनका जवाब सही है , और एक बार फिर वे गेंद के रंग को लेकर एक दुसरे से बहस करने लगे.
मास्टर जी ने उन्हें शांत कराते हुए कहा , ” ठहरो , अब तुम दोनों अपने अपने स्थान बदल लो और फिर बताओ की गेंद किस रंग की है ?”
दोनों ने ऐसा ही किया , पर इस बार उनके जवाब भी बदल चुके थे।
राहुल ने गेंद का रंग काला तो अमित ने सफ़ेद बताया।
अब मास्टर जी गंभीर होते हुए बोले ,” बच्चों , ये गेंद दो रंगो से बनी है और जिस तरह यह एक जगह से देखने पे काली और दूसरी जगह से देखने पर सफ़ेद दिखती है उसी प्रकार हमारे जीवन में भी हर एक चीज को अलग– अलग दृष्टिकोण सेदेखा जा सकता है। येज़रूरी नहीं हैकी जिस तरह से आप
किसी चीज को देखते हैं उसी तरह दूसरा भी उसे देखे…..

इसलिए अगर कभी हमारे बीच विचारों को लेकर मतभेद हो तो ये ना सोचें की सामने वाला बिलकुल गलत है बल्कि चीजों को उसके नज़रिये से देखने और उसे अपना नजरिया समझाने का प्रयास करें। तभी आप एक अर्थपूर्ण संवाद कर सकते हैं। “

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13 May 2014

दूरदर्शिता

दूरदर्शिता

प्रतीक और आकाश ने college के बाद एक साथ एक company join की.
दोनों ने बहुत मेहनत की और अपना काम संभाला.
कुछ साल बाद प्रतीक का promotion सेल्स executive की post पर हो गया. पर आकाश अभी भी अपनी पुरान representative की post पर ही था.
एक दिन आकाश से सहा नहीं गया. वो अपना resignation letter लेकर boss के पास गया. और शिकायत कि की boss अपने मेहनती स्टाफ की value नहीं करते. और केवल उन लोगों की बढ़ोतरी करते है जो उनके नजदीकी है.
Boss जानते थे की आकाश ने पिछले सालो में बहुत मेहनत की है. पर वो उसे दर्शाना चाहते the की उसमे और प्रतीक के कामों में क्या फर्क है. तो उन्होंने आकाश को पास के बाजार जाकर पता करने को कहा अगर कोई तरबूज बेच रहा हो.
आकाश गया, और पता लगाकर आया की ‘हाँ’ बेच रहा है.
फिर boss ने पूछा ,”कितने रुपये kg?”
आकाश फिर से पता करने गया. और आकर कहा की 20 रुपये kg.
अब Boss ने यही काम आकश के सामने, प्रतीक को करने को कहा.
प्रतीक पास के बाजार गया. और थोड़ी देर बाद आकर उसने boss को कहा, “ हाँ boss एक व्यक्ति तरबूज बेच रहा है. उसके भाव 20 रुपये kg बता रहा है. और 10 kg के 175 रुपये. पास ही का रहने वाला है. और कल ही उसके गाँव से ताजे लाया है. तरबूज लाल भी है, और स्वाद में भी अच्छे है. आपके लिए भी sample लाया हूँ.” ये कहकर प्रतीक boss को और आकाश को तरबूज के pieces देने लगा.
आकाश इसे देखकर बहुत प्रभावित हुआ. उसने decide किया की वो job नहीं छोड़ेगा और प्रतीक से सीखेगा. कहानी का आशय यह है की अगर आपको कामयाब होना है तो आपको दूरदर्शी होना होगा.


इस story में undoubtedly प्रतीक का vision बहुत ही ज्यादा गहरा था. वो केवल दिए हुए काम पर ही focus नहीं किया. बल्कि उसने उससे related सारी जानकारी हासिल कर ली. एक कामयाब व्यक्ति बनने के लिए आपको एक बहुत अच्छा observer भी होना चाहिए. आपके आस पास की चीजों से सीखना भी चाहिए. सीखने के लिए पूरी दुनिया ही एक कक्षा है. और यक़ीनन सबसे अच्छी है.दूसरों की बातों से हमें सीखना चाहिए की आखिर वो किस ढंग से काम कर रहे है. और हम कैसे बेहतर काम कर सकते है. और सीखते सीखते ही अपने नज़रिये को भी बेहतर बनाकर. हम आगे बढ़ सकते है..
All d best.


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25 Feb 2014

मेरे नाम का गुब्बारा


एक बार पचास लोगों का ग्रुप किसी सेमीनार में हिस्सा ले रहा था।सेमीनार शुरू हुए अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि स्पीकर अचानक ही रुका और सभी पार्टिसिपेंट्स को गुब्बारे देते हुए बोला , ” आप सभी को गुब्बारे पर इस मार्कर से अपना नाम लिखना है। ”
सभी ने ऐसा ही किया।
अब गुब्बारों को एक दुसरे कमरे में रख दिया गया।
स्पीकर ने अब सभी को एक साथ कमरे में जाकर पांच मिनट के अंदर अपना नाम वाला गुब्बारा ढूंढने के लिए कहा।
सारे पार्टिसिपेंट्स तेजी से रूम में घुसे और पागलों की तरह अपना नाम वाला गुब्बारा ढूंढने लगे। पर इस अफरा-तफरी में किसी को भी अपने नाम वाला गुब्बारा नहीं मिल पा रहा था…पांच मिनट बाद सभी को बाहर बुला लिया गया।
स्पीकर बोला , ” अरे! क्या हुआ , आप सभी खाली हाथ क्यों हैं ? क्या किसी को अपने नाम वाला गुब्बारा नहीं मिला ?”
” नहीं ! हमने बहुत ढूंढा पर हमेशा किसी और के नाम का ही गुब्बारा हाथ आया…”, एक पार्टिसिपेंट कुछ मायूस होते हुए बोला।
“कोई बात नहीं , आप लोग एक बार फिर कमरे में जाइये , पर इस बार जिसे जो भी गुब्बारा मिले उसे अपने हाथ में ले और उस व्यक्ति का नाम पुकारे जिसका नाम उसपर लिखा हुआ है। “, स्पीकर ने निर्दश दिया।एक बार फिर सभी पार्टिसिपेंट्स कमरे में गए, पर इस बार सब शांत थे , और कमरे में किसी तरह की अफरा-तफरी नहीं मची हुई थी। सभी ने एक दुसरे को उनके नाम के गुब्बारे दिए और तीन मिनट में ही बाहर निकले आये।

स्पीकर ने गम्भीर होते हुए कहा , ” बिलकुल यही चीज हमारे जीवन में भी हो रही है। हर कोई  अपने लिए ही जी रहा है , उसे इससे कोई मतलब नहीं कि वह किस तरह औरों की मदद कर सकता है , वह तो  बस  पागलों की तरह अपनी ही खुशियां ढूंढ रहा है  , पर बहुत ढूंढने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिलता , दोस्तों हमारी ख़ुशी दूसरों की ख़ुशी में छिपी हुई है। जब तुम औरों को उनकी खुशियां देना सीख जाओगे तो अपने आप ही तुम्हे तुम्हारी खुशियां मिल जाएँगी।और यही मानव-जीवन का उद्देश्य है।”
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परोपकार का फल



बहुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे . उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।
वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी ,
” आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं। “
आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।
ऋषिवर बोले , “ प्रिय शिष्यों , आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है . मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें .
यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा .”
तो क्या आप सब तैयार हैं ?”
” हाँ , हम तैयार हैं ”, शिष्य एक स्वर में बोले .
दौड़ शुरू हुई .
सभी तेजी से भागने लगे . वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे . वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह – जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था .
सभी असमंजस में पड़ गए , जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीँ अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे ; खैर , सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।
“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों ?”, ऋषिवर ने प्रश्न किया।
यह सुनकर एक शिष्य बोला , “ गुरु जी , हम सभी लगभग साथ –साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी …कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था …और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा -उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े…. इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की .”
“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ “, ऋषिवर ने आदेश दिया .
आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे . पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे . सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे .
“ मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों के देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं .” ऋषिवर बोले।
“ दरअसल इन्हे मैंने ही उस सुरंग में डाला था , और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।
पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम -भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है . पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम -भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है .
अतः यहाँ से जाते -जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना कभी ना भूलें , अंततः वही आपकी सबसे अनमोल जमा-पूँजी 
होगी । “
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30 Jan 2014

३ शिक्षाप्रद कहानिया


ये कुछ ऐसी stories है जो मैंने दूसरे motivational blogs पर पढ़ी..
और आपके लिए translate कर रहा हूँ.. हमारी यही कोशिश रहती है की हिंदी सोच पर best stories ही प्रकाशित करे और ये stories आपको यक़ीनन पढ़ना चाहिए ऐसा मुझे लगता है. क्या है, की इंसान अपने personal experience के through सबसे ज्यादा सीखता है..
और उसके बाद stories के जरिये..
इसीलिए तो हमे बचपन में कहानियाँ सुनाई जाती थी.. खैर.. वो बातें
फिर कभी..
पेश है आज की post..

story #1
बदलाव

एक लड़का हर sunday सुबह सुबह तालाब के किनारे jogging करने जाता था. और हमेशा एक बूढी महिला को देखता था. जो किनारे पर बनी बेंच पर बैठकर तालाब के छोटे छोटे कछुओ को उठाकर उनकी पीठ साफ़ किया करती थी.. 
एक ऐसे ही sunday को जब वो लड़का वहाँ से  गुज़रा तो उसी महिला को देखा.. इस बार वो उनके पास गया और पूछा.. “नमस्ते, मैं हमेशा आपको कछुओ की पीठ साफ़ करते हुए देखता हूँ.. आप ऐसा क्यों करती है?” महिला ने पहले तो उसे देखा, और फिर शांत मुस्कराहट के साथ कहा- ” मैं हर रविवार को यहाँ आती हूँ.. और शान्ति का सुख लेते हुए.. इन छोटे छोटे दोस्तों के कवच साफ़ करती हूँ.. .. दरअसल, इनकी पीठ पर जो काई, और दूसरी चीज़े चिपकी रह जाती है.. उनसे इनके कवच की गर्मी पैदा करने की क्षमता कम पड़ जाती है. और तैरने में भी इन्हें तकलीफ देती है.. कुछ सालो में इनके कवच कमजोर भी पड़ जाते है.. इसलिए मैं यहाँ बैठकर इन्हें साफ़ करती हूँ..” लड़का थोडा हैरान था.. वो बोला ” ये है तो बहुत ही अच्छी बात है.. और मैं समझ सकता हूँ की ये एक अच्छा काम है पर.. क्या आपको नहीं लगता की दुनिया भर में न जाने ऐसे कितने कछुए होगे. और शायद उनकी मदद करने के लिए कोई नहीं है.. आपको नहीं लगता की आप अपने वक़्त का बेहतर इस्तेमाल कर सकती हैं..” महिला ने कहा, ” मुझे इसे करने में ख़ुशी मिलती है.. दुनिया में बदलाव पैदा करने का ये मेरा तरीका है.” लड़का और भी हैरान हुआ.. बोला “इससे भला दुनिया में कैसा बदलाव आएगा?” महिला ने अपने हाथ में रखे कछुए की तरफ इशारा करते हुए कहा.. ” भले ही पूरी दुनिया में इससे कोई बदलाव न आये.. पर इस छोटे से कछुए से पूछो, मेरे इस कार्य से इसके जीवन में कितना बड़ा बदलाव आएगा” सबक: यदि आप सहायता करने के काबिल है. तो करें. हो सकता है आपके द्वारा की हुई छोटी सी मदद पूरी दुनिया में बदलाव की लहर न ला पाए. पर वो एक व्यक्ति, जिसकी आपने हेल्प की है, उसकी दुनिया आप खुशहाल कर सकते है.


story #2
ग्लास का भार एक बार एक साइकोलॉजी की प्रोफेसर class में आई. और एक glass उठा लिया.. सबने सोचा की अब वो वहीँ पुराना ‘ग्लास आधा ख़ाली है या आधा भरा’ वाला lesson पढ़ाएगी. पर उसके बदले उन्होंने छात्रों से पूछा की उनके हाथ में जो glass है उसका वजन कितना है? सभी छात्रों ने अपने अपने अनुसार उत्तर दिए.. किसी ने 50 gram कहा, तो किसी ने 100 ग्राम.. पर महिला प्रोफेसर ने जवाब दिया: ” मेरे ख्याल से इस glass का exact weight matter नहीं करता.. बल्कि ये matter करता है की मैं इसे कितनी देर तक hold करके रखती हूँ. अगर मैं इसे केवल 1-2 minute के लिए उठा के रखती हूँ तो ये मुझे सामान्य सा लगेगा.. पर यदि मैं इसे एक घंटा उठा के रखती हूँ तो मेरा हाथ दुखने लगेगा.. पर यदि मैं इसे पूरा दिन उठा के रखूं.. तो यक़ीनन मेरा हाथ सुन्न पड़ जायेगा.. थोड़ी देर के लिए paralyse हो जायेगा.. मतलब की इसका थोडा सा भार भी, यदि मैं ज्यादा देर तक उठा की रखूं. तो मुझे तकलीफ हो सकती है..” सभी इस उत्तर से सहमत थे. वो आगे बोली, ”इसी तरह अगर, एक छोटी सी problem की चिंता मैं करती रहूँ.. तो पहले वो कोई ख़ास भार नहीं देगी मन पर.. पर यदि मैं उसी के बारे में सोचती रहूँ.. उसी से परेशान रहूँ.. उसी पर stress करती रहूँ.. तो वो छोटी से परेशानी भी मुझे बहुत बड़ी तकलीफ दे सकती है.. मैं डिप्रेशन का शिकार हो सकती हूँ.. मैं दूसरा कुछ भी कार्य करने में असमर्थ हो जाउंगी.. यही तो हमारी actual परेशानी है..” सबक : आप अपने परेशानियो को मन से जाने दे, ये बहुत जरुरी है. आपकी परेशानियां आपके मन में रहे या न रहे ये आप decide कर सकते है. किसी भी problem का इतना stress न लें.. की आपके स्वास्थ को दिक्कत हो..

story #3
ग़लत विश्वास एक experiment के दौरान, एक marine biologist ने एक बड़े से टैंक में एक shark मछली को रखा.. और उसके साथ ही कुछ छोटी मछलियों को भी उसी टैंक में डाल दिया.. जैसा की हम expect कर सकते है की shark ने तुरंत ही उन सारी मछलियों का सफाया कर दिया.. इसके बाद marine biologist ने tank में एक बहुत ही मजबूत fiberglass लगा दिया.. और टैंक के दो हिस्से कर दिए.. एक हिस्से में shark थी. और दुसरे हिस्से में उसने फिर से छोटी मछलियों को डाला.. जैसे ही shark की नज़र उन पर पड़ी.. वो उन्हें खाने के लिए लपकी. पर इस बार बीच में fiberglass होने की वजह से shark उससे जा टकराई.. एक बार टकराने के बाद भी shark ने हार नहीं मानी.. वो हर कुछ minute के अंतराल के बाद उस दिशा में बढती.. जहा मछलिया थी.. और टकरा के फिर पलट आती.. इस दौरान छोटी मछलिया आसानी से और आज़ादी से तैर रही थी.. और कुछ एक डेढ़ घंटे के बाद shark ने हार मान ली. ये experiment पुरे हफ़्ते भर में कई बार किया गया.. धीरे धीरे shark के हमले कम होते गए.. और वो ज्यादा जोर भी नहीं लगाती थी. बार बार कोशिश करते रहने से, पर फिर भी मछलियों तक न पहुँचपाने से शार्क ने थक कर हार मान ली. और प्रयास करना छोड़ दिया. कुछ दिनों के बाद marine biologist ने बिच में मौजूद fiberglass को हटा दिया. पर इसके बाद भी shark ने कभी हमला नहीं किया. shark को पिछले कुछ हफ्तों में विश्वास हो गया था की वो उन मछलियों तक नहीं पहुँच सकती. और दूसरी छोटी मछलिया बिना किसी नुकसान के तैरने लगी.. shark उन तक पहुँचने के कोशिश भी नहीं करती थी. 

सबक : हममे से कई लोग, हार और निराशा को experience करने के बाद, give up कर देते है. वो ये सोचते है की क्योंकि वो पहले कई बार हार चुके है, और सफल नहीं हुए है. इसलिए वे आगे भी ऐसे ही रहेगे.. ऐसा मत कीजिये.

ये तीनो छोटी छोटी hindi short stories ने मुझे motivation और सिख प्रदान की थी.. उम्मीद है आपको भी ये रास आई होगी. यदि आपको इंटरेस्ट हो तो आप और hindi stories पढ़ सकते है. आपको ये कहानियाँ कैसे लगी हमे जरुर बताये comments के माध्यम से

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